कंडोम के कुछ मज़ेदार उपयोग

जितेन्द्र प्रताप सिंह (Jitendra Pratap Singh)
कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग बहुत खुश हुआ जब बनारस के बुनकरों में मुफ्त में बांटे जाने वाले कंडोम की मांग खूब बढ़ गई। स्वास्थ्य विभाग यह सोच रहा था कंडोम बांटने से बुनकरों के जनसंख्या वृद्धि रुकेगी और कंडोम का सही इस्तेमाल होगा लेकिन जब पता चला कि बनारसी साड़ी बनाने वाले बुनकर मुफ्त में मिलने वाले कंडोम का इस्तेमाल साड़ी बनाने में कर रहे हैं तब ना सिर्फ उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग बल्कि पूरी दुनिया चौक उठी थी साड़ी बनाने वाले बुनकर कंडोम का इस्तेमाल अपने करघा पर करते हैं. साड़ियाँ तैयार करने में इस्तेमाल हो रहे हैं कंडोम दरअसल कंडोम में चिकनाई युक्त पदार्थ होता है और करघा पर लगाने से उसके धागे तेज़ी से चलते हैं और उनमें चमक भी आ जाती है. क्योंकि कंडोम में प्राकृतिक रबड़ यानी लैक्टेस होता है इसलिए बुनकर बुनाई के पहले धागों को कंडोम से खूब रगड़ देते हैं जिससे धागे में इतनी अच्छी चिकनाई आ जाती है इस साड़ी की बुनाई करते समय धागा फसता नहीं है और बुनाई तेजी से होता है और साड़ियों में बहुत अच्छी प्राकृतिक चमक आ जात…

एमडीएच (MDH) मसाला मालिक के बारे में कुछ अज्ञात तथ्य ! Some unknown facts about the MDH Spice Owner



  • MDH के मालिक का नाम महाशय धर्मपाल गुलाटी (Mahatmas Dharmapal Gulati) है
  • इनका जन्म 27 मार्च 1923 को पाकिस्तान के सियालकोट में एक सामान्य परिवार में हुआ था
  • इनके पिता का नाम महाशय चुन्नीलाल और माताजी माता चनन देवी था
  • सियालकोट में इनके पिताजी की मसालोंं की एक छोटी सी दुकान थी जिसका नाम महाशय दी हट्टी था
  • इसी महाशय दी हट्टी से नाम आया M – महाशय D- दी H- हट्टी यानि MDH
  • इन्‍होंने 1933 में 5 वी कक्षा मेें फेल होने से स्कूल की पढाई छोड़ दी थी
  • इनके पढाई छोडने के बाद सबसे पहले इनके पिता ने उन्हें लकड़ी का काम सीखने एक बढ़ई के पास भेजा
  • इनका मन वहॉ भी नहीं लगा और ये 8 माह काम करने के बाद वहॉ भी नहीं गये
  • इसके बाद इन्‍होंने साबुन का व्यवसाय किया फिर कपड़ो के व्यापारी बने फिर बाद में ये चावल के भी व्यापारी बने लेकिन इनमेंं से किसी भी व्यापार में वे लंबे समय तक नही टिक सके
  • इसके बाद में इन्होंने दोबारा अपने पैतृक व्यवसाय को ही करने की ठानी और मसालोंं का व्यवसाय किया
  • इसके बाद देश का विभाजन हुआ और ये 27 सितम्बर 1947 को भारत आकर दिल्ली रहने लगे
  • दिल्‍ली आकर इन्‍होंने न्यू दिल्ली स्टेशन से कुतब रोड और करोल बाग़ से बड़ा हिन्दू राव तक तांगा चलाने का कार्य किया
  • इसके बाद कुछ पैसे इकट्ठे कर एक लकडी की दुकान खरीदी और परिवारिक के व्यवसाय यानि मसालों का व्‍यवसाय का कार्य करोल बाग से शुरू किया
  • इसके बाद इन्‍होंने 1953 में अपनी दूसरी दुकान चांदनी चौक में स्‍थापित की
  • इसके बाद 1959 में इन्‍होंने दिल्‍ली के कीर्ति नगर में मसालों की एक फैक्‍ट्री लगा दी
  • इन्होंने अपने ब्रांड MDH का नाम रोशन करने के लिए काफी महेनत की आज एमडीएच की देशभर में 15 फैक्ट्री हैं
  • MDH ब्रांड मसालों के भारतीय बाज़ार में 12 % हिस्से के साथ दुसरे स्‍थान पर है
  • आज MDH कंपनी 100 से ज्यादा देशों मेंं अपने 60 से अधिक प्रोडक्ट्स बेच रही है
  • महाशय धरमपाल गुलाटी जी मसालों के व्‍यापार के साथ-साथ कई सामा‍जिक कार्यों से भी जुडे हुऐ हैं
  • इनकी संस्‍था ने कई स्‍कूल और अस्‍पताल भी बनवाये है
  • जिनमें MDH इंटरनेशनल स्कूल, महाशय चुन्नीलाल सरस्वती शिशु मंदिर, माता लीलावती कन्या विद्यालय, महाशय धरमपाल विद्या मंदिर इत्यादि शामिल है
  • ये 94 साल की उम्र में भारत में 2017 में सबसे ज्यादा कमाने वाले FMCG सीईओ बने
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  • सिद्धार्थ मावाणी 

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