दुनिया की सबसे महंगी सब्जी | World Most Expensive Vegetable

दुनिया में कई तरह की सब्जियां हैं कुछ सब्जियां जो हम नॉर्मल लाइफ में रोजाना खाते हैं। लेकिन कुछ सब्जियां ऐसी हैं। जिसके दाम के बारे में सुनकर आप दंग रह जाएंगे। आज इसी विषय में जानने की कोशिश करेंगे दुनिया की सबसे महंगी सब्जी के बारे में। तो आइये इसके बारे में जानते हैं विस्तार से।
हॉप शूट्स।आपको बता दें की ये सब्जी दुनिया की सबसे महंगी सब्जी हैं। आमतौर पर यह सब्जी 1000 यूरो प्रति किलो बिकती है यानी भारतीय रुपये में कहें तो इसकी कीमत 80 हजार रुपये किलो के आसपास है। इसे खरीद पाना नॉर्मल इंसान के बस में नहीं हैं।आपको बता दें की इस हॉप का इस्तेमाल जड़ी-बूटी के तौर पर भी किया जाता है। सदियों से इसका इस्तेमाल दांत के दर्द को दूर करने से लेकर टीबी के इलाज तक में होता रहा है। हॉप में ऐंटीबायॉटिक की प्रॉपर्टी पाई जाती है जो इंसान के हेल्थ के लिए बहुत फायदेमंद हैं। इससे शरीर की कई बीमारियां दूर हो जाती हैं और इंसान खुद को सेहतमंद महसूस करता हैं।यह सदाबहार सब्जी है जो साल भर उगाई जा सकती है। लेकिन ठंडी के मौसम को इसके लिए ठीक नहीं माना जाता है। मार्च से लेकर जून तक इसकी खेती के लिए आदर्श समय मान…

नेहरू जी ने नेपाल को भारत में विलय करने के प्रस्ताव को क्यों मना किया ! Why did Nehru Ji decline the proposal of Nepal to merge with India

सन २०१० में पूरे विश्व में केवल तीन देश हिन्दू जनसँख्या बहुल राष्ट्र थे - भारत, नेपाल व मॉरिशिअस. नेपाल ने सन १९४७ में भारत की आज़ादी के पश्चात भारत से विलय का प्रस्ताव रखा था.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व संघ प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने कहा था कि वे स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान मंत्री ही थे जिन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. “स्वतंत्रता के कुछ समय पश्चात, नेपाल के तत्कालीन प्रधान मंत्री मात्रिका प्रसाद कोइराला ने भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु को अपने देशवासियों की भारत में विलय की इच्छा से अवगत कराया था.”, सन २००८ में किसी समारोह में के.एस. सुदर्शन ने यह बात सबके साथ साझा की थी. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जवाहरलाल नेहरु ने इस अंतर्राष्ट्रीय निंदा के भय से कि ‘भारत स्वतंत्रता के तुरंत-पश्चात विस्तारवादी हो गया है’, उस विलय-प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था.
सन १९५० में भारत और नेपाल ने एक द्विपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किये, जिससे इन दोनों दक्षिण-एशियाई पड़ोसी देशों के बीच घनिष्ट रणनीतिक सम्बन्ध स्थापित हुए. यह संधि - “१९५० भारत-नेपाल शान्ति तथा मैत्री संधि” के नाम से प्रसिद्ध हुई. मूल रूप से इस संधि से नेपाली नागरिकों को भारत में आर्थिक अवसर मिलते जिसके बदले में भारत को नेपाल की तरफ से भारत की सुरक्षा से सम्बंधित चिंताओं का आदर करने का आश्वासन मिलता. भारत-नेपाल शान्ति तथा मैत्री संधि भारत और नेपाल के बीच एक अन्तर्राष्ट्रीय संधि है जिसके अन्तर्गत दोनों देशों के सम्बन्ध निर्धारित किये गए हैं। इसके अनुसार दोनों देशों की सीमा एक-दूसरे के नागरिकों के लिए खुली रहेगी और उन्हें एक-दूसरे के देशों में बिना रोकटोक रहने और काम करने की अनुमति होगी। यह संधि दोनों देशों के बीच एक घनिष्ट मित्रता का सम्बन्ध स्थापित करती है।
इस संधि पर भारत की तरफ से नवाचार का अनादर करते हुए भारतीय दूत चंदेश्वर नारायण सिंह ने और नेपाल की तरफ से तत्कालीन प्रधान मंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा ने हस्ताक्षर किये थे. अपने बदनाम शासन के अंतिम समय में राणा के पास सोचने-विचारने को बहुत कुछ था.
यह ६ दशक से भी पुरानी संधि पर सन २००८ में खतरा तब मंडराने लगा जब नेपाल में एक गठबंधन सरकार बनायी गयी. तब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी) के नेता पुष्प कमल दहल ने कहा था कि भारत के साथ हुई १९५० की संधि को ख़ारिज कर दिया जाएगा और भारत के साथ एक नयी संधि पर समझौता वार्ता की जायेगी… हालांकि, वे ऐसा करने में असफल रहे और उन्हें अपने शासन के ९ महीनों के भीतर पद-त्याग करना पड़ा.
नेहरु चीन के विस्तारवाद पर चुप्पी साधे उसके द्वारा तिब्बत हड़पे जाने के भी ज़िम्मेदार थे, जिस पर विरोध तो दूर की बात है, उन्होंने उफ़ तक नहीं की. तिब्बत तो तिब्बत, नेहरु ने तब भी कुछ नहीं कहा जब चीन ने सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश पर भी अपना अधिकार बताने की कोशिश की. नेहरु को कम्युनिस्टों का समर्थन चाहिए था, इसलिए नेहरु ने चुप्पी साधे रखी. जवाहरलाल नेहरु की विदेश नीति “आदर्शवाद” की थी. वे केवल संयुक्त राष्ट्र के अपने पश्चिमी-समकक्षों को प्रसन्ना करना चाहते थे; जिनमें से कुछ तो ऐसे भी होंगे जो शायद नेपाल को विश्व-मानचित्र पर ढूँढने का भी कष्ट न उठाते.
सन १९५१ में नेपाल के राजा त्रिभुवन पलायन करके भारत आ गए, इसलिए नहीं कि यह उनकी इच्छा थी, बल्कि इसलिए क्यूँकि उनके पास कोई और चारा नहीं रह गया था. नेपाल का लोक-तंत्र खतरे में था, और राणा-शासन तख्ता-पलट के लिए तैयार बैठा था. राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह ने राणा शासकों का विरोध किया था, जिसके फलस्वरूप उसके पास भारत का समर्थन करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था ताकि उसे राजनीतिक रूप से मजबूती प्राप्त हो. नेहरु इस अवसर को बहुसंख्यक हिन्दुओं को संघटित करने के लिए उपयोग कर सकते थे, परन्तु यहीं से शुरुआत होनी थी नेहरु की वह अरुचिकर विरासत.
भारत एक ऐसा देश है जिसने कभी किसी दुसरे देश पर आक्रमण नहीं किया था. हम चीन जैसे अन्य देशों की तरह विस्तारवाद की नीति में विश्वास नहीं करते. १९५० की संधि में १० अनुच्छेद हैं जिन्हें ज़रुरत पड़ने पर बदला जा सकता है.

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