सैटेलाइट फोन क्या है? क्यों यह बहुत महंगा है?

सैटेलाइट फोन….. 'सैटेलाइट फोन को सेटफोन के नाम से भी जाना जाता है,ये हमारे फोन्स की तुलना में अलग होते हैं। क्योंकि यह लैंडलाइन या सेल्युलर टावरों की बजाय सैटेलाइट (उपग्रहों ) से सिग्नल प्राप्त करते हैं'। ( चित्र सैटेलाइटफोन ) इनकी खास बात यह होती है कि इनके द्वारा किसी भी स्थान से काॅल किया जा सकता है। यह हर जगह उपयोगी साबित होते हैं चाहे आप सहारा मरुस्थल में ही क्यों न हों। कहा तो यह भी जाता है कि यह पानी के अंदर भी आसानी से सिग्नल प्राप्त कर सकने में समर्थ होते हैं। सेटेलाइट फोन बस थोड़ा स्लो होते हैं (हमारे मोबाइल फोन के मुकाबले) यानी बातचीत के दौरान इसमें थोड़ी सी अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि इनके द्वारा भेजे गए सिग्लन को सेटेलाइट तक जाने और वहां से वापस लौट कर आने में ज्यादा समय लगता है।हालांकि यह कमी बहुत ही नगण्य है। यह ज्यादातर आपदाओं के समय हमे काफी सहायक सिद्ध होते जब हमारे सिस्टम बहुत हद तक ख़राब हो गये होते हैं। क्या हम सेटेलाइट फोन खरीद सकते हैं….. भारत में सैटेलाइट फोन खरीदने के लिए विशेष कानून बनाए गए हैं भारत ही नहीं हर देश में इसके लिए अलग…

कबीरदास जी ने ऐसा क्या किया कि उनके गुरू भी उनके सामने नतमस्तक हो गए



एक बार गुरु रामानंद ने कबीर से कहा,
"कबीर,आज श्राद्ध का दिन है और पितरों के लिये खीर बनानी हैआप जाइये,पितरों की खीर के लिये दूध ले आइये।"
कबीर उस समय छोटी आयु के ही थे..
कबीर दूध का बरतन लेकर चल पडे।चलते चलते आगे एक गाय मरी हुई पड़ी मिली।कबीर ने आस पास से घास को उखाड कर,गाय के पास डाल दिया और वही पर बैठ गये।
दूध का बरतन भी पास ही रख लिया।
काफी देर हो गयी,कबीर लौटे नहीं, तो गुरु रामानंद ने सोचा,पितरों को छिकाने का समय हो गया है,कबीर अभी तक नही आया,तो रामानंद जी खुद दूध लेने चल पड़े।
चले जा रहे थे तो आगे देखा कि कबीर एक मरी हुई गाय के पास बरतन रखे बैठे है।
गुरु रामानंद बोले,"अरे कबीर,तू दूध लेने नही गया?"
कबीर बोले: स्वामीजी,यह गाय पहले घास खायेगी तभी तो दूध देगी...!!!
रामानंद बोले:अरे,यह गाय तो मरी हुई है,यह घास कैसे खायेगी?
कबीर बोले: स्वामी जी,यह गाय तो आज मरी है....जब आज मरी गाय घास नही खा सकती,तो आपके 100 साल पहले मरे हुए पितर खीर कैसे खायेंगे?
यह सुनते ही रामानन्दजी मौन हो गये।उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ।
माटी का एक नाग बना के पुजे लोग लुगाया,
जिंदा नाग जब घर में निकले ले लाठी धमकाया।
जिंदा बाप कोई न पुजे मरे बाद पुजवाया,
मुठ्ठीभर चावल ले के कौवे को बाप बनाया।
यह दुनिया कितनी बावरी हैं,जो पत्थर पूजे जाय
घर की चकिया कोई न पूजे,जिसका पीसा खाय
संत कबीर के ये दोहे सदियों से चली आ रहीं पुरानी परम्पराओं पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर देते हैं।
वास्तव में जब कबीरदास जी का धरा पर आगमन हुआ था,उस समय आज से भी कई गुना ज्यादा कुरीतियाँ, अन्धविश्वास और बेसिरपैर की मान्यताएं समाज में प्रचलित थीं,जिनका कबीरदास जी ने जमकर विरोध किया।
उनके सटीक और साहसिक विचारों ने उनके गुरू रामानन्द को भी उनके समक्ष नतमस्तक कर दिया था,जिनसे सूझ बूझ से जबरदस्ती कबीर ने अधिकारपूर्वक दीक्षा ली थी जिसका पूर्ण वर्णन इसी प्रश्न के दूसरे उत्तरों में प्रभावशाली ढंग से दिया गया है।

Comments