बैंक वाले चेक के पीछे हस्ताक्षर क्यों करवाते हैं ! Why Do The Bank Sign On The Back Of The Check

चलीये, इसपर गौर करते है। मान लो की कोई खाताधारक बँकसे अपने पैसे निकालने हेतू अपना चेक जमा कर देता है, खजांची उसे पैसे दे देता है। वो घर चला जाता है। काम खतम। पर क्या होगा, जब थोडेही देरमे वही आदमी खजांचीसे कहता है की मेरा टोकन गुम हो गया, आप मुझे पैसे दे दिजीए। अब खजांची के पास तो पैसे देनेका कोई सबुत नही है। ऐसी अवस्थामे चेक के पिछे किया हुआ हस्ताक्षर काम मे आता है। ये मात्र नियमो के अनुसार पाली गई एक सुरक्षा व्यवस्था है। मेरी चालिस साल की करिअर मे मैने कभी किसींको दुबारा पैसे मांगते हुवे नही देखा। ये इसिलीये भी किया जाता है की टोकन लेनेके बाद अगर सचमे वो उसे घुमा देता है, और कोई गैर आदमी पैसे लेने बँक मे आता है, तो वो सही हस्ताक्षर कर नही पायेगा और पकडा जायेगा। और एक बात है। जब बेअरर चेक से पैसे लेनेवाला बादमे पैसे मिलने से इन्कार करता है, तब ये हस्ताक्षर उसे पकडवा सकते है। आपको याद होगा की बेअरर चेक से बडी रकम निकलनेवाले के हस्ताक्षर ऊसके पॅन कार्डसे मिलानेके बाद ही खजांची उसे पैसे दे देता है, साथमे उसका पॅन नंबर भी लिख लेता है। बँक ये सभी बाते केवल आपके पैसोंकी सुरक्षा के लिये ही क…

भारत पाकिस्तान के बंटवारे को लेकर कुछ दिलचस्प तथ्य ! Some interesting facts about the partition of India



भारत पाकिस्तान बंटवारे से संबंधित कुछ ऐसे तथ्य जो आपको किसी इतिहास के किताब में नहीं मिलेंगे। देखने से लेख आपको बड़ा लग रहा है, लेकिन एक बार अवश्य पढ़े।
3 जून 1947
आज तय हुआ कि आजाद भारत की शक्ल कैसी होगी। इस दिन तत्कालीन भारत के वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन, जवाहर लाल नेहरू, बलदेव सिंह तथा मुस्लिम राष्ट्र की मांग करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना एक साथ मौजूद थे। लॉर्ड माउटबेटन ने सबसे पहले यह आल इंडिया रेडियो से यह ऐलान किया कि आज़ादी के बाद 2 देश बनेंगे। तत्पश्चात कांग्रेस इस बात से सहमत है, इसका ऐलान जवाहर लाल नेहरू ने आल इंडिया रेडियो से किया। जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि
भारत के विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए मुझे खुशी नहीं हो रही। मुझे इसमें संदेह भी नहीं है कि इस समय बस यही एक रास्ता है। हमारे पास भारत के किसी भी भाग का स्वेच्छा से संघ से बाहर रहने का प्रस्ताव हम सभी को अखरेगा।
4 जून 1947 को माउंटबेटन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी थी, इस कॉन्फ्रेंस में दुनिया भर के 300 पत्रकार भारत के भविष्य को लेकर माउंटबेटन से सवाल करने के लिए मौजूद थे।
माउंटबेटन ने कहा कि
अब चूंकि मैंने 15 अगस्त 1947 की स्टीमर की टिकट करा ली है तो भारत और पाकिस्तान को आज़ादी 15 अगस्त को ही मिलेगी।
यह खबर पूरे देश के लिए आश्चर्य चकित करने वाली थी, क्यूंकि इस ऐलान के पहले अंग्रेजों ने जून 1948 में देश छोड़ने की बात कही थी। इसका मतलब था कि बंटवारा और आज़ादी महज 72 दिनों की और बात थी।
लेकिन इस घोषणा के साथ ही एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ। सवाल ये था कि आखिरकार कितने मुल्क आजाद हो रहे थे? 2 या 565?
एक तरफ तो हम ये सुनते आ रहे थे कि अंग्रेजों ने पूरे भारत को एक सूत्र में बांध दिया था, फिर ये 565 अलग अलग देश की बात कहां से आई? दरअसल ब्रिटिश भारत के छोटे मंझोले तथा बड़े रियासतें मिलाकर पूरे 565 रजवाड़े थे। इन रियासतों पर अंग्रेज़ों का राज था। जिसे पैरामांउटसी (Paramountcy) कहते थे। इन सभी रजवाड़ों कि अपनी जमीन, अपनी पुलिस, अपने कानून और तो और कुछ की अपनी मुद्राए भी थी।
अब जब अंग्रेज जा रहे थे, तो उन्होंने कहा कि अब पैरामांउटसी भी खत्म हो जाएगी।सभी रजवाड़े अपना भविष्य तय करने के लिए स्वतंत्र होंगे। इस वक़्त जिन्ना देश के सभी रियासतों को स्वतंत्र होने के लिए उकसा रहे थे। उनका मकसद था कि हिंदुस्तान किसी भी हालत में कमजोर रहे। लेकिन माउंटबेटन ही एक ऐसे इंसान थे जो इन 565 रजवाड़ों को भारत के साथ लाने में सहायता कर सकते थे।
माउंटबेटन को भी इस बात की चिंता थी कि इतिहास में लोग उन्हें अच्छे कामों के लिए जाने, अतः उन्होंने अपने सलाहकार वी पी मेनन के कहने पर इस बात को गंभीरता से लिया। क्यों कि अभी आज़ादी से पहले ही पंजाब और बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा ने अपना काम शुरू कर दिया था।
चूंकि माउंटबेटन ब्रिटिश रॉयल फैमिली से थे तो सभी रजवाड़ों कि उनसे दोस्ती स्वाभाविक थी। तो माउंटबेटन हिंदुस्तान के साथ खड़े हो गए। माउंटबेटन, जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल के देखरेख में वी पी मेनन ने रियासतों के विलीनीकरण के दस्तावेज बनाए गए, जिनपर सभी राजाओं को दस्तखत करना था।
त्रवंकोर ने खुद को आजाद घोषित कर दिया, 12 जून 1947 को हैदराबाद ने खुद को 15 अगस्त 1947 के बाद आजाद मुल्क होने की घोषणा कर दी।
रियासती मामलों के लिए एक अलग मंत्रालय का गठन किया गया। सरदार वल्लभ भाई पटेल उसके मंत्री बने और वी पी मेनन उसके सेक्रेटरी। 5 जुलाई 1947 को आल इंडिया रेडियो के जरिए सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सभी राजाओं से संपर्क साधा।
इस संपर्क का उल्टा ही असर हुआ, जितने राजा अब तक विलीनीकरण पर राजी थे उनमें से इन 4 राज्यों के बगावत को देखकर उन लोगो ने भी खुद को स्वतंत्र घोषित करने का फैसला कर लिया।
25 जुलाई 1947
इस दिन माउंटबेटन ने एक भाषण दी, जिसे कहा जाता है कि यह माउंटबेटन के जिंदगी कि बहुत ही महत्त्वपूर्ण भाषण थी जिसमे उन्होंने यह नहीं कहा कि आप हिंदुस्तान में रही या पाकिस्तान में रहो, उन्होंने बस लाभ बताए। उन्होंने ने कहा कि अपना और अपने जनता के लाभ को देखते हुए अपना विलीनीकरण करें। इस बात से हिंदुस्तान को बहुत फायदा हुआ।
लेकिन इस वक़्त अभी भी हैदराबाद, भोपाल, जोधपुर तथा जूनागढ़ बगावती तेवरों पर उतारू थे। भोपाल, जूनागढ़ और जोधपुर पाकिस्तान से मिलने को उतारू थे। यह भी अफवाह थी कि जैसलमेर पाकिस्तान में शामिल होने वाला है।
जैसलमेर 1947 से लेकर 15 फरवरी 1949 तक इस असमंजस के था कि भारत के रहे की पाकिस्तान में। 6 अगस्त को जोधपुर का 36000 स्क्वायर किलोमीटर पाकिस्तान के हाथ जाने वाला था। सोचिए अगर वो हिस्सा पाकिस्तान के हाथो चला जाता तो आज हिन्दुस्तान का भूगोल कैसा होता।
9 अगस्त को माउंटबेटन ने जोधपुर के महाराजा को बुलावा भेजा और कहा कि सरदार पटेल से मिलो, लेकिन महाराजा 10 अगस्त को पटेल से मिले, जहां सरदार पटेल ने महाराजा हनुमंत सिंह से वार्तालाप की और उन्हें हिंदुस्तान के मिलने के लिए मना लिया। उन्होंने सीधा सीधा बोल दिया कि अगर जोधपुर वासियों ने बगावत कर दी तो आप भारत सरकार से किसी भी प्रकार की उम्मीद नहीं रखियेगा।
आज़ादी से 4 दिन पहले तक भारत बिखरा हुआ था, लेकिन अंततः 547 रियासतों के मिलने के साथ नए भारत का निर्माण हुआ।

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