What is the current conflict between China and India?

Why is there tension on the borders?


It is a common misconception that the tensions ferment at the border and then it reaches the capitals. That never is the case.

The primary duty of a government is to give a decent life to its citizens. And that requires money. Money, which is raised through industries and services. India and China are two of the biggest economies in the world today, and by 2050, China would become the biggest economy with India coming at the second number.

I have lived in Europe and North America and the Made in China has completely overwhelmed me. There are hardly anything that you buy, that is not Made in China. In contrast to that, this laptop that I bought from India, my mobile which I bought from India, my cloths and other accessories are still Made In India. China sees India as a huge untapped market and wants to flood its good with it, however the Indian government has not budged till now and there are still a lot of trade restriction, despite the trade bal…

कैलाश मंदिर के रहस्य ! Mystery Of Kailasa Temple INDIA




वैसे तो भारत देश ऐसी चीजों से भरा पड़ा है जिसे सुनकर किसी के भी होश उड़ जाएं पर फिर भी यदि किसी एक के बारे में बताना हो तो मैं कैलाश मंदिर के बारे में बताऊंगा जिसके बारे में सुनकर ना सिर्फ विदेशी बल्कि अपने देश के लोगों के भी होश उड़ सकते हैं।
कैलाश मंदिर को जो बात खास बनाती वह यह कि यह मंदिर पूरा (अंदर और बाहर) सिर्फ एक ही पत्थर को तराश कर बनाया गया है । यानि आपको इस मंदिर के पत्थरो में एक भी जोड़ नहीं मिलेगा।
कैलाश मंदिर विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पत्थर की एक पूरी चट्टान को काटकर (तराश कर) कर बनाया गया है और यही बात इस मंदिर को सबसे अद्भुत बनाती है । ना सिर्फ बाहर से बल्कि अंदर से भी मंदिर में बेहतरीन नक्काशी की गई है ।
पर जो बात इसे सबसे ज्यादा खास व आश्चर्यजनक बनाती है वह यह कि यह मंदिर आज से तकरीबन 1200 साल पहले बनाया गया था। जब इंसान के पास सिर्फ छैनी और हथौडी के अलावा और कोई मशीन नहीं होती थी।
कैलाश मन्दिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले में प्रसिद्ध ‘एलोरा की गुफ़ाओं’ में स्थित है। कैलाश मंदिर बनाने में एकदम अनोखा ही तरीका अपनाया गया। यह मंदिर एक पहाड़ के शीर्ष को ऊपर से नीचे काटते हुए बनाया गया है। जैसे एक मूर्तिकार एक पत्थर से मूर्ति तराशता है, वैसे ही एक पहाड़ को तराशते हुए यह मंदिर बनाया गया।
पत्थर काट-काट कर खोखला करके मंदिर, खम्बे, द्वार, नक्काशी आदि बनाई गयी। क्या अद्भुत डिजाईन और प्लानिंग की गयी होगी। इसके अतिरिक्त बारिश के पानी को संचित करने का सिस्टम, पानी बाहर करने के लिए नालियां, मंदिर टावर और पुल, महीन डिजाईन बनी खूबसूरत छज्जे, बारीकी से बनी सीढ़ियाँ, गुप्त अंडरग्राउंड रास्ते आदि सबकुछ पत्थर को काटकर बनाना सामान्य बात नहीं है।
आज के वैज्ञानिक और शोधकर्ता अनुमान लगाते हैं कि मंदिर बनाने के दौरान करीब 4,00,000 टन पत्थर काट कर हटाया गया होगा। इस हिसाब से अगर 7,000 मजदूर 150 वर्ष तक काम करें तभी यह मंदिर पूरा बना होगा, लेकिन बताया जाता है कि कैलाश मंदिर इससे काफी कम समय महज 17 वर्ष में ही बनकर तैयार हो गया था।
उस काल में जब बड़ी क्रेन जैसी मशीने और कुशल औजार नहीं होते थे, इतना सारा पत्थर कैसे काटा गया होगा और मंदिर स्थल से हटाया कैसे गया होगा। यह रहस्य दिमाग घुमा देता है। क्या किसी परग्रही तकनीक का प्रयोग करके यह मंदिर बनाया गया ? कोई नहीं जानता मगर देखकर तो ऐसा ही लगता है।
ऐसा माना जाता है कि कैलाश मंदिर को राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) ने 757-783 ई0 में निर्मित कराया था। इसके अतिरिक्त इस मंदिर को बनाने का उद्देश्य, बनाने की टेक्नोलॉजी, बनाने वाले का नाम जैसी कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण लेख बहुत पुराना हो चुका है एवं लिखी गयी भाषा को कोई पढ़ नहीं पाया है।
पत्थर काटकर बनाने की बात तो दूर अगर साधारण तरीके से भी अगर आज के समय ऐसा मंदिर बनाया जाए तो उस के लिए हज़ारो ड्राइंगस, पत्थर को काटने वाली आधुनिक मशीनें, 3डी सॉफ्टवेयर, छोटे मॉडल्स, सैकड़ों इंजीनियर, गणना करने के लिए उच्च क्षमता वाले कंप्यूटर की आवश्यकता पड़ेगी।
इसके अलावा हमें यह भी याद रखना होगा कि इस मंदिर को बनाने के लिए हजारों लोगों ने एक साथ मिलकर काम किया होगा। जरा सोच कर देखिए कि उनका तालमेल कितना बेहतरीन रहा होगा क्योंकि यदि कोई एक हिस्सा भी गलत बन जाता तो उसे सुधार पाने की गुंजाइश भी नहीं थी।
उस काल में यह सब कैसे सुनिश्चित किया गया होगा ? कोई जवाब आज तक वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज जब हमारे पास अत्यधिक विकसित तकनीक मौजूद हैं तब भी हम ऐसा दूसरा मंदिर बनाने के बारे में नहीं सोच सकते। आज भी इस तकनीक से मंदिर बनाना शायद इंसान के बस की बात नहीं।

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